Follow by Email

Monday, March 12, 2012

बचपन कि यादों कि खट्टी मिट्ठी कैरियां ले लो ............


 ये दौलत भी ले लो , ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी ....................खुबसूरत ग़ज़ल के वो बोल जो मुझे मेरे बचपन कि यादों के उस भरे मैदान में ले जानते हैं जहाँ जा कर मैं जी भर कर खेलती हूँ I बचपन किसी का भी हो ....किसी खरीदी हुयी ख़ुशी का मोहताज़ नही होता है ...वो मोहताज़ होता है ..कुछ ममता भरे पलों को .....मुट्ठी भर बाबूजी कि डांट का .........भाई के लिए कि हुई चुगलियों का .......मई की सुहानी सुबह में खुली आँगन में कन्नेर के पेड़ पर कोयल के कूकने का ..बचपन मोहताज़ होता है आज़ादी का ..शरारत करने की आज़ादी की.....हर ऐसी खट्टी मिट्ठी यादों का मोहताज़ होताहै बचपन ...बचपन मोहताज़ होता है आज़ादी ,ढेर सारी आज़ादी का .........आज़ादी शरारत करने की ......... आज़ादी डांट के बाद रोने की ......                               मैं ये नही कह सकती कि मेरे बचपन में कोई कमी नही थी पर ये कह सकती हूँ कि मेरा बचपन बेहद सुन्दर था ,इतना सुन्दर था कि किसी कमी का अहसास न रहा ...एक भाई एक बहेन में मैं छोटी थी I पापा कि लाडली थी मैं ...माँ से आगाध स्नेह ...भाई से जनम कि दुश्मनी थी मेरी ,इत्ती दुश्मनी की  पहली    बार लेखनी उठने में भी बैर ले लिया मैंने I  मुझ में और भाई में सिर्फ १५ महीनो का अंतर था ...इतना कम अंतर का परिणाम ये हुआ की भाई की शिक्षा के साथ मेरी पढाई शुरू ,वो पढता A ,B ,C और बताता D फॉर doll मतलब गुडिया ....बस शुरू हो जाता मेरा तमाशा कि भाई ने doll  मतलब गुडिया क्यूँ बोला ये नाम तो सिर्फ मेरा है ना ? उफ़ माँ पापा थक जाते समझते -समझते पर मैं...मैं तो ना मानने वालों में से थी I मेरा तमाशा तभी ख़तम होता जब मुझे से भी पुछा जाता doll  मतलब क्या ?  और मैं बताती doll मतलब अनु (अनु मेरे भाई का प्यार से बुलाने वाला  नाम है )  I इतने झगडे के बाद भी शरारत के लिए भाई बहुत प्यारा हो जाता था मुझे I मुझे याद है पापा के एक मित्र को सिगरेट पीने कि इतनी बुरी लत थी कि वो हमारे यहाँ भी जब आते ..४० मिनट की   मेहमान कमरे की उस मीटिंग में १२- १५ सिगेरटों को उनके गंतव्य तक पहुंचा देते I  उनके सिगरेटों के गन्तव्य तक पहुँचाने के इस अभियान में एक दिन लगे  हांथों हम भाई बहन ने भी सहियोग प्रदान कर दिया ,माँ पापा उन्हें विदा करने के लिए बाहर गए और इधर हमने ऐश ट्रे  में अध् बुझी सिगेरेट के दो -दो कश लगा लिए ...फिर??? ...फिर कुछ भी नही हुआ  ,माँ पापा को भी नही पता चला Iमेहमान कमरे में पहले से भरे धुआं ने कुछ भी चुगली नही की  I 

           जब वी मेट ....जी हाँ इस फिल्म के एक डयलोग पर तो मेरा अधिकार है "bye GOD ..मुझे बच्चपन से शादी करने का बड़ा क्रेज़ है जी ........सन ८२ में जब मैं मात्र तीन साल की  थी तभी मुझे अपनी बुआजी की बड़ी बेटी  की शादी में जाने का मौका मिला  I  अच्छे अच्छे कपडे ,सजे धजे लोग ,गीतसंगीत ,तरह तरह के पकवान ..मेरी लिए शादी के सही मायने बन चुके थे  I  परिणाम ये निकला की बस विवाह समारोह  से लौट कर मैंने अपने लिया दूल्हा ढूंढना शुरू कर दिया  I  पिताजी पेशे से शिक्षक रहे हैं सो करके हमारे यहाँ उनके विद्यार्थी पढने भी आते थे ...इसलिए मेरी पहली खोज यहीं से शुरू हुयी ...".छोटी से प्यारी सी फ्रिल वाली वाला फर्क पहना दो माँ और बालों की चोटी बना दो ...जल्दी करना माँ ..वर्ना पापा लकी भइया,दानिश भइया सब लोगों को वापस भेज देंगे   I  माँ मुझे लगता है की मैं लकी भइया से शादी कर लेती हूँ ...चीनी वाली टाफी जो लाते हैं  I  "  बस ,मेरा ये कहना होता और माँ का जी भर के हँसना होता I  कभी कभी मेरी इन बातों में हमारी पड़ोस में रहने वाली दीदी  भी शामिल होती ...वो मुझे दुल्हे  के नाम के लिए सुझाव भी देती  I   

      मैं और मेरी भाई  दोनों को बचपन में एक्टिंग बहुत शौक था  I  कुछ फिल्मों की सीन तो हमे रटे हुए थे जैसे शोले का "कितने आदमी थे ".....चश्मे बद्दूर से "अछन मिया की दुकान और फारुख शेख की उधारी "  I  इन सब में  मेरे लिए विवाद का मुद्दा बनता था  बार बार मुझे कालिया वाला रोल ही मिलना जबकि मुझे गब्बर की तरह चटान पर बेल्ट पटकते हुयी खौफ बनाने का शौक  था  I  मेरे लिए विवाद के कई मुद्दे आते रहते थे ...एक बार तो भाई ने मेरी गुडिया की आँख को ही काना कर दिया ...भला था ये बर्दाश्त करने वाला मुद्दा ?.. पापा माँ क्या सजा मुकरर करते हैं भाई के लिए ये जाने बिना मैंने अपने खूंखार दांतों से उसे दांत काट कर सजा दे दी  I  बाद में कोर्ट में दोनों पक्षों की दलील जाने के बाद दोनों को दोषी मानते हुए दोनों को सजा दी गयी ,पर मैं संतुष्ट थी की चलो सजा तो मिली पर मैंने अपना बदला ले लिया  I  

हम भाई बहेन एक समय में एक दुसरे के बहुत सगे हो जाते थे ...एक तो भूत से डर लगने की बात पर ,दूसरा आज कौन अपने दूध का ग्लास गिराएगा ? इन दोनों मुद्दों पर हमारी खूब जमती थी  I  मुझे आज भी याद है मंगल वार की रात,दूरदर्शन का रात १० बजे का वो सीरियल "किले का रहस्य "   I   देखना भी पसंद बाद में डरना भी बहुत पसंद ...सर्दी की रात हो तो रात भर रजाई में टॉर्च ऑन करके किसी तरह अपने डर को भगा लेते थे पर गर्मी की रात में तो बस ..इतना डरना की पिता जी की डांट भी उसके आगे अच्छी लगती थी  I  लगता था डांट ले  पर अपने कमरे में सोने की आज्ञा  दे दें  I  जाने कितनी यादों के साथ सजा है मेरा बचपन ..मुझे मेरा बचपन बेहद कीमती लगता है  I  बचपन में बड़ों के सपने देखना तो पसंद था मुझे पर बड़ा होना नही और आज भी यही पसंद है मुझे .....आज भी उसी  छोटी सी गुडिया की शैतानी मुझे जीवन सुर लगते हैं ....आज भी मेरा भाई मेरे करीब है पर वो बहुत बड़ा हो गया है जो बचपन में मेरी शैतानियों पर मुस्कुरा कर मुझे और बढ़ावा  देता था ....गर्मियों की छुटियों में बसते का सिमटना और खिलोनो  का निकलना ......हमारे रिजल्ट के लिए माँ का पहले से ही बेसन के लड्डू बना कर रखना ......जाड़े की रात में मेरे लिए ही खास तौर पर पापा का गज़र का हलुआ लाना और प्यार से मुझे गोद में बैठा कर खिलाना ...मेरी बेटी का कमरा तमाम खिलोनो से भरा पड़ा है ..पर उसका बचपन इन्ही संजोने वाली यादों से खली पड़ा है ,जिसे मैं चाह कर भी उससे नही दे सकती ............