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Sunday, February 12, 2012

अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो

बाबुल मैं तेरे आँगन की भोर ,
मेरी साँझ की चिंता मत कीजियो ,
जीवन दिया है मेरे तन को ,
जी भर के मन को सांस भी लेने दीजियो ,
बाबुल मैं तेरे आँगन की कोयल ,
कुहुक में विदाई का गीत मत भर दीजियो ,
लक्ष्मी हूँ सरस्वती के स्वर से 
मेरे मन मंदिर को सुर दीजियो ,
बाबुल मैं तेरे घर की सोन चिरैया 
पराया धन कह कर मोहे 
एक क़ैद न दीजियो ,
कौन देश भी जाऊं
तेरा मोह न बिसर पाऊ
एक बार तो मोहे कलेजा का टुकड़ा समझ कर
सीने से लगने दीजियो ,
बाबुल मैं तेरे जीवन की डोर
पराये हांथों की पतंग मत कीजियो ,

1 comment:

Anant Bhardwaj said...

बहुत ही सुन्दर कविता... हर दूसरी पंक्ति बाध्य करती है उस बिटिया को देखने के लिए, जिसने बाध्य किया आपको ऐसी मिस्सरी घोलने के लिए..
सरल शब्दों में माँ लक्ष्मी, शारदे को नमन....