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Sunday, March 2, 2014

बेला का शहर


ये शामिल है .........मेरे यादों में,
इसे अल्लाहाबाद नहीं बेला का शहर कहूं ,
संगम कहूं या बिछडी हुई नावों का मनज़र कहूं .....
तेरे पावन किनारे कहूं या ,,,या हांथों से से सरकती रेत कहूं ........
गुन गुनी धुप कहूं .....या आखों से ओझल होती शाम .................
आबादी के शोर में गुम होता मेरा बरबादियों का शोर कहूं ................
तू बता ए शहर तुझे में क्या कहूं ,
दिलों का संगम कहूं या मेरी बेला का शहर कहूं ........

Monday, March 12, 2012

बचपन कि यादों कि खट्टी मिट्ठी कैरियां ले लो ............


 ये दौलत भी ले लो , ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी ....................खुबसूरत ग़ज़ल के वो बोल जो मुझे मेरे बचपन कि यादों के उस भरे मैदान में ले जानते हैं जहाँ जा कर मैं जी भर कर खेलती हूँ I बचपन किसी का भी हो ....किसी खरीदी हुयी ख़ुशी का मोहताज़ नही होता है ...वो मोहताज़ होता है ..कुछ ममता भरे पलों को .....मुट्ठी भर बाबूजी कि डांट का .........भाई के लिए कि हुई चुगलियों का .......मई की सुहानी सुबह में खुली आँगन में कन्नेर के पेड़ पर कोयल के कूकने का ..बचपन मोहताज़ होता है आज़ादी का ..शरारत करने की आज़ादी की.....हर ऐसी खट्टी मिट्ठी यादों का मोहताज़ होताहै बचपन ...बचपन मोहताज़ होता है आज़ादी ,ढेर सारी आज़ादी का .........आज़ादी शरारत करने की ......... आज़ादी डांट के बाद रोने की ......                               मैं ये नही कह सकती कि मेरे बचपन में कोई कमी नही थी पर ये कह सकती हूँ कि मेरा बचपन बेहद सुन्दर था ,इतना सुन्दर था कि किसी कमी का अहसास न रहा ...एक भाई एक बहेन में मैं छोटी थी I पापा कि लाडली थी मैं ...माँ से आगाध स्नेह ...भाई से जनम कि दुश्मनी थी मेरी ,इत्ती दुश्मनी की  पहली    बार लेखनी उठने में भी बैर ले लिया मैंने I  मुझ में और भाई में सिर्फ १५ महीनो का अंतर था ...इतना कम अंतर का परिणाम ये हुआ की भाई की शिक्षा के साथ मेरी पढाई शुरू ,वो पढता A ,B ,C और बताता D फॉर doll मतलब गुडिया ....बस शुरू हो जाता मेरा तमाशा कि भाई ने doll  मतलब गुडिया क्यूँ बोला ये नाम तो सिर्फ मेरा है ना ? उफ़ माँ पापा थक जाते समझते -समझते पर मैं...मैं तो ना मानने वालों में से थी I मेरा तमाशा तभी ख़तम होता जब मुझे से भी पुछा जाता doll  मतलब क्या ?  और मैं बताती doll मतलब अनु (अनु मेरे भाई का प्यार से बुलाने वाला  नाम है )  I इतने झगडे के बाद भी शरारत के लिए भाई बहुत प्यारा हो जाता था मुझे I मुझे याद है पापा के एक मित्र को सिगरेट पीने कि इतनी बुरी लत थी कि वो हमारे यहाँ भी जब आते ..४० मिनट की   मेहमान कमरे की उस मीटिंग में १२- १५ सिगेरटों को उनके गंतव्य तक पहुंचा देते I  उनके सिगरेटों के गन्तव्य तक पहुँचाने के इस अभियान में एक दिन लगे  हांथों हम भाई बहन ने भी सहियोग प्रदान कर दिया ,माँ पापा उन्हें विदा करने के लिए बाहर गए और इधर हमने ऐश ट्रे  में अध् बुझी सिगेरेट के दो -दो कश लगा लिए ...फिर??? ...फिर कुछ भी नही हुआ  ,माँ पापा को भी नही पता चला Iमेहमान कमरे में पहले से भरे धुआं ने कुछ भी चुगली नही की  I 

           जब वी मेट ....जी हाँ इस फिल्म के एक डयलोग पर तो मेरा अधिकार है "bye GOD ..मुझे बच्चपन से शादी करने का बड़ा क्रेज़ है जी ........सन ८२ में जब मैं मात्र तीन साल की  थी तभी मुझे अपनी बुआजी की बड़ी बेटी  की शादी में जाने का मौका मिला  I  अच्छे अच्छे कपडे ,सजे धजे लोग ,गीतसंगीत ,तरह तरह के पकवान ..मेरी लिए शादी के सही मायने बन चुके थे  I  परिणाम ये निकला की बस विवाह समारोह  से लौट कर मैंने अपने लिया दूल्हा ढूंढना शुरू कर दिया  I  पिताजी पेशे से शिक्षक रहे हैं सो करके हमारे यहाँ उनके विद्यार्थी पढने भी आते थे ...इसलिए मेरी पहली खोज यहीं से शुरू हुयी ...".छोटी से प्यारी सी फ्रिल वाली वाला फर्क पहना दो माँ और बालों की चोटी बना दो ...जल्दी करना माँ ..वर्ना पापा लकी भइया,दानिश भइया सब लोगों को वापस भेज देंगे   I  माँ मुझे लगता है की मैं लकी भइया से शादी कर लेती हूँ ...चीनी वाली टाफी जो लाते हैं  I  "  बस ,मेरा ये कहना होता और माँ का जी भर के हँसना होता I  कभी कभी मेरी इन बातों में हमारी पड़ोस में रहने वाली दीदी  भी शामिल होती ...वो मुझे दुल्हे  के नाम के लिए सुझाव भी देती  I   

      मैं और मेरी भाई  दोनों को बचपन में एक्टिंग बहुत शौक था  I  कुछ फिल्मों की सीन तो हमे रटे हुए थे जैसे शोले का "कितने आदमी थे ".....चश्मे बद्दूर से "अछन मिया की दुकान और फारुख शेख की उधारी "  I  इन सब में  मेरे लिए विवाद का मुद्दा बनता था  बार बार मुझे कालिया वाला रोल ही मिलना जबकि मुझे गब्बर की तरह चटान पर बेल्ट पटकते हुयी खौफ बनाने का शौक  था  I  मेरे लिए विवाद के कई मुद्दे आते रहते थे ...एक बार तो भाई ने मेरी गुडिया की आँख को ही काना कर दिया ...भला था ये बर्दाश्त करने वाला मुद्दा ?.. पापा माँ क्या सजा मुकरर करते हैं भाई के लिए ये जाने बिना मैंने अपने खूंखार दांतों से उसे दांत काट कर सजा दे दी  I  बाद में कोर्ट में दोनों पक्षों की दलील जाने के बाद दोनों को दोषी मानते हुए दोनों को सजा दी गयी ,पर मैं संतुष्ट थी की चलो सजा तो मिली पर मैंने अपना बदला ले लिया  I  

हम भाई बहेन एक समय में एक दुसरे के बहुत सगे हो जाते थे ...एक तो भूत से डर लगने की बात पर ,दूसरा आज कौन अपने दूध का ग्लास गिराएगा ? इन दोनों मुद्दों पर हमारी खूब जमती थी  I  मुझे आज भी याद है मंगल वार की रात,दूरदर्शन का रात १० बजे का वो सीरियल "किले का रहस्य "   I   देखना भी पसंद बाद में डरना भी बहुत पसंद ...सर्दी की रात हो तो रात भर रजाई में टॉर्च ऑन करके किसी तरह अपने डर को भगा लेते थे पर गर्मी की रात में तो बस ..इतना डरना की पिता जी की डांट भी उसके आगे अच्छी लगती थी  I  लगता था डांट ले  पर अपने कमरे में सोने की आज्ञा  दे दें  I  जाने कितनी यादों के साथ सजा है मेरा बचपन ..मुझे मेरा बचपन बेहद कीमती लगता है  I  बचपन में बड़ों के सपने देखना तो पसंद था मुझे पर बड़ा होना नही और आज भी यही पसंद है मुझे .....आज भी उसी  छोटी सी गुडिया की शैतानी मुझे जीवन सुर लगते हैं ....आज भी मेरा भाई मेरे करीब है पर वो बहुत बड़ा हो गया है जो बचपन में मेरी शैतानियों पर मुस्कुरा कर मुझे और बढ़ावा  देता था ....गर्मियों की छुटियों में बसते का सिमटना और खिलोनो  का निकलना ......हमारे रिजल्ट के लिए माँ का पहले से ही बेसन के लड्डू बना कर रखना ......जाड़े की रात में मेरे लिए ही खास तौर पर पापा का गज़र का हलुआ लाना और प्यार से मुझे गोद में बैठा कर खिलाना ...मेरी बेटी का कमरा तमाम खिलोनो से भरा पड़ा है ..पर उसका बचपन इन्ही संजोने वाली यादों से खली पड़ा है ,जिसे मैं चाह कर भी उससे नही दे सकती ............



Sunday, February 12, 2012

अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो

बाबुल मैं तेरे आँगन की भोर ,
मेरी साँझ की चिंता मत कीजियो ,
जीवन दिया है मेरे तन को ,
जी भर के मन को सांस भी लेने दीजियो ,
बाबुल मैं तेरे आँगन की कोयल ,
कुहुक में विदाई का गीत मत भर दीजियो ,
लक्ष्मी हूँ सरस्वती के स्वर से 
मेरे मन मंदिर को सुर दीजियो ,
बाबुल मैं तेरे घर की सोन चिरैया 
पराया धन कह कर मोहे 
एक क़ैद न दीजियो ,
कौन देश भी जाऊं
तेरा मोह न बिसर पाऊ
एक बार तो मोहे कलेजा का टुकड़ा समझ कर
सीने से लगने दीजियो ,
बाबुल मैं तेरे जीवन की डोर
पराये हांथों की पतंग मत कीजियो ,

Monday, January 23, 2012

रा- वन ....एक खोज


रा-वन ..........वैज्ञानिक परिकल्पनाओ पर आधारित बॉलीवुड मसाला फिल्म ,  एक्शन ,गीत संगीत ,गलेमर  से सजी  मनोरंजन से भर पूर फिल्म ,ये शायद एक सामान्य फिल्म समीक्षा  होगी पर मेरे  आधार पर इसकी समीक्षा थोड़ी और विस्तृत होगी .......देखा जाइये तो यह फिल्म एक पूरे कंप्यूटर गेम पर आधारित थी ....एक कंप्यूटर गेम जिसकी कोडिंग जीरो और वन के रूप (binary code ya machine code ) की जाती है जिसे कोई प्रोग्रामर या ड़ेवेलोपेर सामान्य मानव की भाषा में alphanumeric  शब्दावली में syntax के द्वारा कोड करता है .....ये कोड किस पर से इंसानी सर ज़मी पर लाखों कोशिकाओं के समूह या उतक संरचना ,माईटरोकानडेरिया में परिवर्तित हो कर एक असाधारण मानव बन जाती है हो सवयम प्रोग्रामर या ड़ेवेलोपेर के जान का दुश्मन और समाज के लिए घातक हो जाता है ..यहाँ तक की इस खलनायक रुपी प्रोग्रामिंग नष्ट करने के लिए एक दूसरी प्रोग्रामिंग के दवरा एक नायक भी तैयार  किया जाता है जो की न सिर्फ मनुष्य की तरह चलता फिरता है खाता है पीता है ...बल्कि नायिका के साथ नृत्य संगीत कालुफ्त भी  उठाता है (हाजमोला सर के बाद भी डकारें आ रही हैं )........जिस तरह से विज्ञानं अविष्कार कर रहा है उस आधार पर किसी भी चीज़ को असंभव कहना मुमकिन नही क्यूंकि शायद अकबर बीरबल के ज़माने में कोई उनसे ये कहता की ऐसा समय आएगा जब मनुष्य बिना किसी माध्यम के एक जगह से बैठे -२ दूसरी जगह बैठे मनुष्य से बात कर सकेंगे वो जिस अवस्था में हैं उसी अवस्था में व्यक्तिगत रूप में ,तो शायद उस इंसान को पागल ही करार दिया जाता ....इस आधार पर ये भी कहा जा सकता है कि हम दिखियी इसी लिए देते हैं क्यूंकि हमारे शरीर से टकराकर प्रकाश कि किरणे प्रवर्तित होती हैं और हम दीखते हैं ,यदि हमारा शरीर पारदर्शी हो जाये तो ये किरणे आर पर हो जाएँगी और शायद हम न दिखे (कृपया धयान दे ये मैंने कहीं पढ़ था इस पर कल से ही कोई प्रयोग प्रक्रिया आरम्भ न करे ..जनहित में नही समाज हित में जारी ..धन्यवाद )......यानि mr india भी संभव है ..फिर से चेतावनी ...गुड .....हम आते हैं फिर से रा - वन पर ......गेमिंग  वर्ल्ड कि पारी लोक जैसी दुनिया में दैत्यों कि संभावनो वाली यह फिल्म बच्चों को तो ३ डी के साथ पसंद ही था ......पर वयस्कों के लिए किसी प्रकार पाचक चूरन कि आवशयकता लगेगी ऐसा निदेशक को लगा इस लिए गीत संगीत के साथ फुल टू करीना कि अदाएं और एक जुबान पर चढ़ने वाला मस्त गीत भी दे दिया .....बिलकुल  फ्री ....मह्लिओं के लिए शाहरुख़ भइया हैं ही ......मेरे अनुसार यह औसत से अधिक पर बहुत अच्छी से थोडा यानि अच्छी फिल्म कि श्रेणी में आती है .....एक आखिर शिकायत छोटे बच्चों के मुख से कुछ अश्लील शब्दावली ,करीना कि ब्रांड न्यू  गालियाँ और कहीं कहीं अजीब से हसने कि कोशिश में डाले गए सीन ने फिल्म कि प्रभाविकता को कहीं न कहीं प्रभावित किया ..........अगर आप मुझ से पूछेंगे कि किस कलाकार ने मुझे सब से ज्यादा प्रभावित किया तो मेरा जवाब होगा ..बाल कलाकार अरमान वर्मा उर्फ़ प्रतीक सुब्रमन्यम ने ......उसके हियर  स्टाइल ने ,आँखों कि चमक ने व बहुत ही सहज अदाकारी ने मुझे प्रभावित किया ..............कुल मिला कर ये एक मसाला फिल्म है ......और सिनेमा घरों में जा कर पैसे खर्च कर देखि जाने वाली फिल्म है (क्षमा के साथ समयावधि पर कतई  भी धयान न दे जिस प्रकार से मैंने फिल्म का आधार गेमिंग परिकल्पना के जीवंत होने पर नही दिया  ) ....................भूल चुक ,किसी भी प्रकार कि त्रुटि के लिए क्षमा .........धन्यवाद

Tuesday, October 5, 2010

स्वप्न..

सपनों के पंख नहीं होते ,गर होते तो मेरे आखों में ना सजते
सजते पर अधूरे ना होते ,पंख के साथ उनकी मंजिल तक पहुँचते
सपनों के पंख कट गए मेरी मर्यादों के धार से ....
मर्यादों की धार जो काट ना सकी समाज की तलवार को

Wednesday, July 1, 2009

दोष हीन


आज गणेश चौथ है ......
फिर ललही छठ होगा .....फिर हरितालिक तीज .....
कहीं पुत्र के लिए ...कहीं पति के लिए ..
मेरे जीवन की उपस्थिति के लिए कोई व्रत नही ....
क्या मेरे उपस्थिति आज भी माँ ओं को कुंती बनाती है ??
मैं भी तो उसी हाड मांस का जनमा ,आस्थि पिंजर हूँ ,
फिर क्यूँ इतना भेद ???
मेरे हाथों के से लगी बाबूजी के आँखों में ऐनक ने भी मुझे अस्तित्व हीन ही समझा ,
मेरे हाथों से ओढाई हुयी शाल ने भी माँ को मेरे होने के अहसास से नही ढका....
मेरे आँखों ने देखे हुए सपनो ने भी मेरे अनुजों को मेरे होने का गर्व नही कराया ,
आज भी मेरे जनम को किसी पालीथीन में घुठने को मजबूर करते हो .. ...
तुम्हारे अंश से ही बनती हूँ जन्मदाता .....फिर क्यूँ करके मुझ से इतना द्वेष ?